Thursday, April 14, 2011

जी चाहता है...

कभी अपनी हंसी पर आता है गुस्सा कभी सारे जहां को हंसाने को जी चाहता है... कभी छुपा लेती हूं गमों को किसी कोने में कभी किसी को सब कुछ सुनाने को जी चाहता है... कभी हंसती हूं किसी के कहने पर कभी यू ही आंसू बहाने को जी चाहता है... कभी अच्छा लगता है है आज़ाद घुमना कभी किसी बंधन में बंध जाने को जी चाहता है... कभी लड़ती हूं खुदा से ऐसे ही बेवजह कभी उस खुदा को ही मनाने को जी चाहता है... कभी लगती है ये ज़िदगी बढ़ी हसीन सी तो कभी ज़िंदगी से ही उठ जाने को जी चाहता है...

Sunday, January 16, 2011

घोटाला---घोटाला---घोटाला

घोटाला---घोटाला---घोटाला….
यहां का घोटाला, वहां का घोटाला

अब आप सोच रहे होंगे कि इतने घोटालों के बाद आज मुझे घोटालों की याद क्यों आ गई... दरअसल मैं कुछ दिनों से कहीं interview की तैयारी कर रही थी, तो सोचा के कुछ घोटालों के बारे में ही पढ लेती हूं.... लेकिन google पर जब ऐंट्री मारी तो सोचा कि मैं भी अपने interview में कोई घोटाला कर दूं , मैंने सोचा की छोड़ो यार interview फिर कभी दूंगी क्योंकि घोटालों की लिस्ट ही बहुत लम्बी थी लेकिन फिर सोचा कि आज से ही तैयारी शुरू कर देती हूं तभी जा के तैयार हो पाऊंगी.... जब मैंने पढ़ना शुरू किया तो शुरूआत में ही फंस गई, क्योंकि 2 जी घोटाले से लेकर आर्दश सोसायटी घोटाले तक कई हजार करोड़ो रुपये फंसे पड़े है तो मेरा फंसना भी जायज़ ही है ना भई.... हर जगह तो कॉमन लोगो की वेल्थ फंसी प़डी है लेकिन मज़ाल है कि कलमाड़ी का कोई कुछ बिगाड़ पाया हो... गेम्स खत्म,घोटाला हज़म... चलो फिर मैं इसे छोड़ अगले घोटाले की ओर बढ़ी और सत्यम घोटाले का सत्य ढूंढने में लगी रही लेकिन सत्यम घोटाले का सत्य क्या है ये तो आज तक हमारी सरकार ही सामने नहीं ला पायी फिर मेरी क्या मज़ाल... फिर ये सोचती रही कि तेलगी मामले (स्टांप घोटाला) में भी सरकार कब अपनी फाइनल स्टांप लगाएगी... फिर याद आया कि अरे सरकार तो खुद बोफोर्स मामले में फंसी पढ़ी है.... कांग्रेस बीजेपी और बीजेपी कांग्रेस पर कमेंट मार रही है... सोनिया से लेकर लालू सभी इसी खेल के बेहतरीन खिला़ड़ी है.... अपने लालू यादव चारा घोटाले का पैसा तो कुछ इस कदर घोट के पी कर बैठे हैं कि क्या बताए... फिर अनाज घोटाला कैसे रह सकता है, अरे भई जब लालू इंसान हो कर चारा हजम कर सकते है तो कई और नेता मिल कर अनाज हजम क्यों नहीं कर सकते... खैर कुछ आगे बढ़ी तो सिटी बैंक घोटाले के बारे में जब डिटेल में पढ़ा तो इस बात का अहसास हुआ कि अगर सिटी बैंक के इतने लाखों- करोड़ों रुपयों का सहीं इस्तेमाल हुआ होता तो अपने देश की कई सिटी की किस्मत चमक जाती.... इससे पहले अगर मैं इन घोटालों के बारे में पढ़- पढ़ के अपना गला घोट देती मैंने टीवी देखना जरूरी समझा... लेकिन जैसे ही टीवी ऑन किया वहां IPL की मंडी चल रही थी... जहां क्रिकेटर्स को खरीदा बेचा जा रहा था... फिर क्या था उस मंडी के मोल- भाव से मुझे लगा कि इस IPL में कुछ तो झोल हैं... लेकिन तभी मुझे पिछले IPL में फंसे ललित मोदी और शशि थरूर की याद आ गई क्योंकि इन दोनों ने भी घोटालों की लिस्ट में खूब नाम कमाया था क्योंकि आप तो जानते है कि बदनामी में भी नाम जो होता हैं.... अरे भई ये हमारा देश हैं भारत.... यहां तो बच्चा पैदा होते ही कोई तगड़ा घोटाला करने की सोचता है क्योकि इन घोटालों में कुछ खास तो होता नहीं लेकिन NAME FAME और खासतौर पर MONEY तो जबरदस्त मिल ही जाती हैं... चलों इसे पढ़ के हमारे देश को और लोगो को तो कोई फायदा हुआ नहीं लेकिन मुझे तो जरूर हो गया क्योंकि मुझे लगता हैं कि अब मैं अपने interview के लिए तो तैयार हो ही गई हूं.... चलो अलविदा... बाय बाय... अरे रूकों रूको अपने हर्षद मेहता तो रह ही गए जो इतना बड़ा घोटाला कर के अपनी ज़िंदगी हर्ष- उल्लास से जी रहे हैं.... चलो अब हम चले, अगर कुछ रह गया हो तो सोच लेना कि मैंने भी लिखने मे घोटाला कर दिया है...
अपने कमेंट लिख कर जरूर बताना की मैं भी कहीं घोटालेबाज़ तो नहीं ???? आगर कुछ रह गया हो तो जरूर बताना हां...

Friday, October 8, 2010

तुझे भुला दिया...


बचपन की नादानी मे एक भूल सी मुझसे हो गई
एक अनजाने को अपना समझ, प्यार के सपने संजो गई

उससे मिलना- जुलना बाते करना अच्छा लगने लगा
दूसरी ओर मेरी ज़िंदगी मे नर्क का दरवाज़ा खटकने लगा

न मुझे उससे प्यार था, न उससे कोई उम्मीद
बस इन्ही बातों बातों मे, कई महीने गए थे बीत

कुछ दोस्तों ने मेरी दोस्ती को प्यार का नाम दे दिया
उस मनचले ने भी इस दोस्ती को प्यार रूप मे ले लिया

ये दोस्ती "मा-पा" के दिमाग मे कई सवाल बो गई
फ़िर रीति- रिवाज़ और संस्कृति मे ये दोस्ती कही खो गई

एक गलती से मुझसे मेरी हंसी खुशी सब रुठ गई
मां की ममता, पा का प्यार, दोस्तों की दोस्ती न जाने कहां छुठ गई

रात के अंधेरे मे रो - रो कर पश्चाताप करती रही
कही पापा भाई कोई देख न ले, इस बात से भी डरती रहीं

न जाने प्यार नाम से मैंने क्यों डर इतना पाया हैं
सपनें, मा- पा, हंसी खुशी सभी कुछ गवाया हैं

न जाने प्यार इश्क मोहब्बत जैसे नामों से क्यों चीढ़ सी मुझे हो गई है
कभी मा- पा को वापिस पा पाऊंगी, ये उम्मीद भी कहीं खो गई हैं

अपनों की दिल दुखा कर, दोस्तो को भुला कर न जाने कहां जाऊंगी
पर हां, ज़िंदगी मे मैं कभी "प्यार" को न समझ पाऊंगी

Thursday, August 26, 2010

फेस क्रीम से पेन रिलिफ़ तक


बचपन में जब गली में अपने दोस्तो के साथ खेला करती थी, तब से शीला आंटी को देख रही हूं...उन्हें बच्चों से बेहद लगाव था,अक्सर वो हमें अपने घर ले जाया करती थी ! हम सभी खूब मस्ती किया करते थे...आंटी को सजने संवरने का बेहद शोक था ! एक दिन हम सभी खेल रहे थे कि अमर अंकल (शीला आंटी के पत्ति) घर फिल्म की दो टिकटें लेकर आए और आंटी को कहा चलो फिल्म देखने चलते है..आंटी बहुत खुश हो गई और जल्द से तैयार भी...घर से निकल ही रहे थे कि अचानक आंटी ने अकंल को कहा कि रुको मैंने फेस क्रीम तो लगाई नहीं..अंकल को पहले गुस्सा तो आया, लेकिन बाद में आंटी को देख के शांत भी हो गया...वो फिल्म देखने चले गए और हम बच्चे अपने अपने घर....अगले ही दिन आंटी ने बताया कि हम लोग रांची शिफ्ट हो रहे है क्योंकि अंकल की जॉब ट्रांसफर हो रही है..आंटी जहां एक और अंकल की तरक्की से खुश थी वही दूसरी ओर हम बच्चों से अलग होने से दुखी भी थी..हम उस वक्त बहुत छोटे थे तो हम सभी बच्चों ने रोज़ की मिलने वाली जेब खर्ची में से कुछ पैसे बचा कर आंटी को गिफ्ट देने की सोची, काफ़ी सोचने के बाद हम बच्चों ने एक गिफ्ट लिया और पैक करवा कर आंटी को दिया..आंटी ने जैसे ही गिफ्ट खोला, खोलते ही हम बच्चों को गले से लगा लिया, आखिंर गिफ्ट जो था...आंटी की फेवरट फेस क्रीम, आंटी अंकल रांची चले गए और धीरे धीरे हम अपनी अपनी ज़िंदगी में मस्त हो गएकल ही रात को मां के साथ किचन में मां का हाथ बट्टा रही थी कि मां ने अचानक कहा..अरे बेटा वो शीला आंटी नहीं थी जो हमारे घर के सामने रहती थी, जिनके पति का रांची मे में जॉब ट्रांसफर हो गया था (मां शायद डिटेल में इसलिए बता रही थी, क्योंकि उस वक्त मैं महज 5-6 साल की थी, तो मां को लगा कि मैं भूल गई होंगी, लेकिन कुछ रिश्ते खून के न होते हुए भी बहुत खा़स होते हैं ) तो मैंने मां से कहा कि हां मां अच्छे से याद है, क्या हुआ उन्हें ? मां ने कहा कि बेटा अमर अंकल की वापिस दिल्ली में जॉब ट्रांसफर हो गया हैं...उस वक्त मन तो किया कि भाग कर जाऊ और आंटी से खूब बाते करुं...लेकिन रात काफ़ी हो गई थी..अगले दिन मुझे ऑफिस भी जल्दी जाना था तो सुबह भी नहीं मिल पायी..शाम को ऑफिस से घर आते वक्त सोचा कि आंटी के लिए कुछ ले लू..तो उनके लिए फेस क्रीम से अच्छा गिफ्ट क्या होता, तो वहीं ले लिया...शाम को मैं सीधा शीला आंटी के घर ही पहुंची ! आंटी ने मुझे पहचाना ही नहीं, क्योकि बचपन में जो देखा था मुझे..लेकिन जैसे ही मैंने उनको गिफ्ट दिया और धीमे से कहा शीला आंटी मैं नवनीत..ये सुनते ही आंटी ने मुझे इस कदर गले लगाया जैसे मैं उनकी ही बेटी हूं, जिसे काफी लंबे वक्त बाद वे मिली थी,गले लगा कर मुझे खूब प्यार किया, कितने सवाल किए कि मैं क्या करती हूं, कहां जाती हूं, कितने बजे वापिस आती हूं ? वगैरह वगैरह ! हम बातें कर ही रहे थे कि अचानक आंटी को याद आया कि उनकी दवा का टाइम हो गया है तो आंटी ने अपनी दवा की पोटली खोली जिसमें तकरीबन हर रंग की गोली थी, मेरे पूछने पर आंटी ने बताया कि ये जोड़ो के दर्द की दवा हैं और हंसते हुए कहा कि बेटा अब मुझे फेस क्रीम की नहीं कोई पेन रिलिफ़ क्रीम गिफ्ट करना क्योकि अब पेन रिलिफ़ क्रीम के बिना हिला भी नहीं जाता, और हम ज़ोर से हंसने लगे...रात काफी़ हो गई थी तो मैं अपने घर आ गई और खाना खा के सोने चली गई,बैड पर जा के सोचा कि आंटी का फेस क्रीम से पेन रिलीफ़ तक का इतना लम्बा सफ़र सिर्फ यादों में ही निकल गया...

Wednesday, July 21, 2010

नकस्ली से डरे या नकली से


कल शाम ऑफिस में हल्का सा सिर दर्द हुआ तो सोचा दवा क्या खाऊं 1 कप चाय पी लेती हूं, वैसे भी दवाईयां नकली ही तो आ रही हैं, तो पेपर उठाया ओर कैंटीन चाय पीने चली गई..पेपर में नक्सलियों के हमलों पर ख़बर थी कि "नक्सली हमले में 56 जवान शहीद"..तो वहीं कैंटीन में 2 दोस्त भारती और जय भी बैठे थे जो कोल्ड ड्रिंक पी रहे थे तो समोसे, नमकीन, बिस्कुट भी आ गए..समोसो के साथ मिली टमेटो कैचप पर चर्चा शुरू हुई और भारती ने कहा कि ये मत खा ये नकली हैं, मैंने भी हंसते हुए कह दिया कि तुम्हारी कोल्ड ड्रिंक नकली हैं...फिर जय ने कहा तुम्हारी चाय की चाय पत्ती नकली हैं..फिर क्या था बात बढ़ने लगी
भारती--सब्जियां नकली
जय--दालें नकली
मैं-- अरे सबसे जरूरी मसाले नकली
भारती--घी नकली
जय--पैसे (नोट) नकली
मैं--दवाईंयां नकली और तो और डॉक्टर ही नकली
भारती--कॉस्मेटिक्स प्रोडक्ट नकली
जय--दूध नकली
मैं--शराब नकली
भारती--खून नकली हैं
जय--MCD का स्टॉफ नकली
नेताओं के वादें नकली हैं, वकीलों के गवाह नकली हैं, बिजनेसमैन की सेल्स रिपोर्ट नकली हैं, रिश्तें नकली हैं इतने मे हमारे बॉस कैंटीन में आये और हमें डांटा कि ऊपर काम पड़ा हैं और तुम यहां गप्पे मार रहे हो..हम उठे और चल पड़े..और जाते जाते कहां सब नकली हैं पर बॉस की गाली और डांट असली हैं, इसमें कोई मिलावट नहीं...बिल्कुल प्योर....



Sunday, July 4, 2010

यहीं झूठ हैं कि मैं झूठ नहीं बोलता !


कहते हैं मरने के बाद हमें अपने हर छोटे-बड़े सच-झूठ का ब्यौरा खुदा को देना होता हैं..हम सभी ने अपने जीवन में बहुत से झूठ बोले होंगे, अगर आप याद करें तो हो सकता हैं कि आपको अब याद भी न हो कि आपने कौन सा झूठ कब और किससे बोला था..अगर हम नज़र डाले तो हम सभी बचपन से ही झूठ बोलते आ रहे हैं..बचपन में कभी स्कूल न जाना हो तो पेट में अक्सर दर्द होता था, और अगले दिन टीचर से कह देना कि मां बीमार थी और तो और कभी-कभी तो हमनें अपने कई रिश्तेदारों को भी मार दिया...मां- बाप से झूठ बोलकर दोस्तों के साथ खूब फिल्में देखी और कई बार फीस का बहाना मार के पैसे भी लिए...ये तो हुए सिर्फ बचपन के झूठ हम आज भी अपनी रोज़मर्रा की ज़िदंगी में ना जाने कितने ही झूठ बोलते हैं..जैसे फोन पर किसी से बात न करनी हो तो, मैं अभी बिज़ी हूं, मीटिंग में हूं, इंडिया में ही नहीं हूं... दोस्तों के साथ कहीं जाना हो तो आज ऑफिस में ऑवरटाइम हैं, स्कूल या कॉलेज में एकस्ट्रा क्लास हैं, गाड़ी खराब हो गयी हैं, रास्ते में ट्रैफिक हैं वगैरह-वगैरह...

अगर आज कोई आपसे कहें कि मैं झूठ नहीं बोलता तो वो यकीनन झूठ ही बोल रहा है...सिर्फ आप ही नहीं सभी झूठ बोलते हैं, नेताओं का वोट मांगने का काम ही झूठे वादों से शुरू होता हैं, वकीलों को जीतने के लिए अक्सर झूठे गवाह खड़े करने पड़ते हैं, बिज़नेसमैन को टैक्स बचाने के लिए झूठी सेल्स रिपोर्ट बनानी पड़ती हैं, फिल्मी सितारें भी अक्सर झूठी कोंटरवर्सी का सहारा लेते हैं, जिससे वो और उनकी फिल्में लोगों की नज़र मे आ जाए, और आज-कल तो डॉक्टरों को भी पैसे एंठने के लिए झूठी रिपोर्टें दिखानी पढ़ती हैं

आखिर हम झूठ बोलते ही क्यों हैं ? जब हमें पता भी हैं कि झूठ के पैर नहां होते, और हमें झूठ को हमेशा याद भी रखना पढ़ता हैं कि हमने कौन सा झूठ किससे बोला था...जाने अनजाने में अगर हम भूल गए कि हमने क्या झूठ बोला था तो सच खुद-ब-खुद सामने आ जाएगा और हम उस सच को छुपाने के लिए एक और झूठ बोल देंगे क्योंकि आपने तो वो कहावत सुनी ही होगी कि एक झूठ को छिपाने के लिए सौ नए झूठ बोलने पढ़ते हैं....अरे ये मत भूलो यारों कि हमें कभी न कभी अग्नि परीक्षा भी देनी पढ़ सकती हैं....So Stay Away

Monday, June 21, 2010

Yeh Mera India


झीलों पर पानी बरसता हैं, हमारे देश में

खेत पानी को तरसता हैं, हमारे देश में

ज़िंदगी का हाल ख़स्ता हैं, हमारे देश में

दूध मंहगा और खून सस्ता हैं, हमारे देश में

तभी तो आज अमीरों और पागलों को छोड़कर

कौन खुलकर हंसता हैं, हमारे देश में ?